7 मार्च 2026 को ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के आठवें दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से बिना किसी शर्त के तत्काल आत्मसमर्पण की मांग की। ट्रंप ने एक कड़े बयान में कहा कि ईरान को अपने सभी परमाणु हथियार कार्यक्रम को नष्ट करना होगा और अमेरिकी सैन्य निरीक्षण को स्वीकार करना होगा। इसी बीच इजरायली वायुसेना ने तेहरान पर व्यापक हवाई हमले किए, जिनमें ईरान के रक्षा मंत्रालय, सैन्य मुख्यालय और परमाणु अनुसंधान केंद्रों को निशाना बनाया गया। इस संघर्ष ने पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की आग में झोंक दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी गहरे संकट में डाल दिया है।
अमेरिकी मांग: बिना शर्त आत्मसमर्पण क्यों?
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि केवल ईरान के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण से ही मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बताया कि पिछले 8 दिनों में अमेरिकी B-2 स्टेल्थ बॉम्बर और टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों ने ईरान की 60-70 प्रतिशत परमाणु उत्पादन क्षमता को नष्ट कर दिया है। नतांज और इस्फहान के यूरेनियम संवर्धन संयंत्र बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। हालांकि, फोर्डो सुविधा जो पहाड़ों के 80 मीटर नीचे बनी है, अभी भी बड़े पैमाने पर बरकरार है। यही कारण है कि ट्रंप अब जमीनी सैनिकों की तैनाती पर भी विचार कर रहे हैं।
इजरायल के हमले: तेहरान में तबाही
इजरायली वायुसेना ने 7 मार्च को तेहरान पर अब तक का सबसे बड़ा हवाई हमला किया। F-35I एरोनोट लड़ाकू विमानों और बैलिस्टिक मिसाइलों से किए गए इन हमलों में तेहरान के पास स्थित ईरानी वायु सेना के मुख्य अड्डे को भारी नुकसान पहुंचाया गया। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार तेहरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में 340 से अधिक लोगों की मौत हुई है और 1,200 से ज्यादा लोग घायल हैं। ईरान की वायु रक्षा प्रणाली ने कई मिसाइलें मार गिराईं, लेकिन इजरायल के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों ने ईरान की रक्षा में कई खामियां उत्पन्न कर दीं।
ईरान का जवाब: क्षेत्रीय युद्ध का विस्तार
ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमलों का जवाब देने के लिए अपने सहयोगियों को सक्रिय कर दिया है। लेबनान में हिज्बुल्लाह ने उत्तरी इजरायल पर 500 से अधिक रॉकेट दागे। इराक और सीरिया में ईरान समर्थित मिलिशिया ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए। यमन में हूती ताकतों ने सऊदी अरब, UAE और व्यावसायिक जहाजरानी को निशाना बनाया। ईरान ने अपनी शहाब-3 बैलिस्टिक मिसाइलें इजरायल पर दागीं जिनमें से 12 मिसाइलें नेगेव रेगिस्तान में गिरीं। इसके अलावा ईरानी साइबर सेना ने अमेरिकी वित्तीय संस्थानों पर बड़े साइबर हमले किए, जिससे न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज पर 4 घंटे के लिए कारोबार ठप हो गया।
भारत पर प्रभाव: कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत इस संकट में अत्यंत जटिल कूटनीतिक स्थिति में है। एक तरफ भारत का अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी है, दूसरी तरफ ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना और तेल आयात के माध्यम से गहरे आर्थिक संबंध हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में सैन्य अभियान की निंदा करने वाले प्रस्तावों से दूरी बनाए रखी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ईरानी, अमेरिकी और रूसी समकक्षों के साथ लगातार संपर्क में हैं। भारत खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है जो युद्धरत पक्षों के बीच बातचीत का मार्ग प्रशस्त कर सके।
वैश्विक प्रतिक्रिया: रूस और चीन की चेतावनी
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कड़ी चेतावनी दी है कि ईरान में सामरिक परमाणु हथियारों के उपयोग को वे एक लाल रेखा मानेंगे जिसके उल्लंघन पर रूस जवाब देने के लिए बाध्य होगा। चीन ने अपने अमेरिकी राजदूत को वापस बुला लिया और सैन्य-से-सैन्य वार्ता स्थगित कर दी। शंघाई सहयोग संगठन ने अमेरिकी-इजरायली सैन्य अभियान को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के आपातकालीन सत्र में 147 देशों ने तत्काल युद्धविराम के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि अमेरिका, इजरायल, ब्रिटेन और केवल तीन अन्य देशों ने इसके विरुद्ध मतदान किया।
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
ईरान युद्ध के आठवें दिन वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं – यह 2022 के बाद पहली बार हुआ है। ब्रेंट क्रूड 101.50 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। सोने की कीमतें 3,200 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचीं। भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 90.40 पर आ गया। भारत, जो अपनी 85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतें आयात से पूरी करता है, पर इसका विशेष रूप से गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। अगर तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं तो भारत का तेल आयात बिल सालाना 35-40 अरब डॉलर बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध के आठवें दिन की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यह संघर्ष जल्द समाप्त होने के कोई संकेत नहीं दे रहा। ट्रंप की बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग और ईरान की क्षेत्रीय युद्ध विस्तार की नीति एक खतरनाक टकराव की ओर इशारा कर रही है। वैश्विक समुदाय, विशेष रूप से भारत जैसे देश जो इस युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदार नहीं हैं लेकिन इसके आर्थिक और कूटनीतिक प्रभावों से बुरी तरह प्रभावित हैं, एक शीघ्र राजनयिक समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। DyGrow के साथ बने रहें – हम आपको ईरान युद्ध की हर अपडेट से जोड़े रखेंगे।